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खुशमिजाज़

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नमस्कार दोस्तों , लम्बे समय के बाद ब्लॉग पर अपनी अगली कविता प्रस्तुत की है । कोरोना के इस संकट काल में हर व्यक्ति ने कोई न कोई करीबी खोया है , मगर ज़िन्दगी फिर भी थम नही सकती है । वक्त चल रहा  है  यह गतिशील है यह अपनी रफ़्तार से रुकता नही है किन्तु इंसान की ज़िन्दगी की रफ़्तार कभी बदलती रहती है कभी यही धीमी हो जाती है तो कभी तेज चलती है और ज़िन्दगी एक समतल  मैदान पर आ दौड़ती है । हमें आस पास आगे पीछे हर जगह सीखने को मिलता रहता है और इस निरन्तर चाल से ही हमारी ज़िंदगी की गति होती है ।  महामारी के इस दौर में हर व्यक्ति परेशानी झेल रहा है , कुछ व्यवसाय से , तो कुछ आय से  और कुछ नही तो फालतू वाली राय से चिंतित है । आज की कविता की पंक्तियो हर घड़ी में स्थिर कैसे रहना है ,इसका प्रयास  किया गया है कि जब  सब कुछ असंभावित लगता है तब उस वक्त भी एक सम्भावना जरूर होती है ।  अतः ज़िन्दगी में हर वक्त खुश ही रहना चाहिए, आशा करती हूँ कि आपको मेरी यह  कविता " खुशमिजाज़"  ज़रूर पसन्द आएगी , और आप जीवन 😁😁😁 में खुुश रहेंगें। मैं बहुत  खुशमिजाज़  हूँ, थोड़ा...

मैं 'बेचैन' क्यूँ हूँ?

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मैं 'बेचैन' क्यूँ हूँ? हँसी-ख़ुशी, उदासी-ग़म हमारे जीवन का हिस्सा होते हैं ।  इंसान के जीवन में व्यवहारिक क्रियाओं के जरिए भीतर के भाव झलकते(प्रदर्शित होते)  है।ज्यादातर समय इंसान के मन में क्या चल रहा है ?  यह सामने वाले को उसकी हरकतों के माध्यम से अंदेशा हो जाता है । किन्तु इंसान के जीवन में सबका स्वभाव भिन्न होता है । कुछ लोगों के स्वभाव में स्वचालित क्रियाएँ होती है और अन्य लोग अपने स्वभाव को किसी भी स्थिति में नियंत्रित रखने में सक्षम रहते है।ऐसे में जाहिर सी बात है कि नियंत्रण के समय  मन के भीतर कुछ न कुछ तो जरूर छुपा रहता है , क्या छुपा है?  यह किसके साथ बताना चाहिए, किसके साथ नही बताना चाहिए, यह मन को असमंजस में डाल देता है । कौन इस बात का सही हल निकाल सकता है ,और सबसे आवश्यक है कि हल का सही समय क्या है ?    सब हल की उम्मीद हम अपने करीबी दोस्तों , परिवारिक सदस्यों से ही करते  हैं । मगर कुछ बातें ऐसी भी होती है: "जिनको हम न छुपा सकते है , न ही किसी से बता सकते हैं"। इस तरह हम दुविधा में फँस जाते  हैं . इसी में...

आज़ादी बूटे दी...

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नमस्कार दोस्तों मेरा आज के लेख का नाम "आज़ादी बूटे दी" है। बूटा पौधे को कहा जाता है। इस लेख का प्रकाश  हमारे पर्यावरण से हो रही मौलिक छेड़छाड़ से सम्बंधित है । आप इस लिख को जरूर पढ़ें  और आपसे विनति है कि आप पर्यावरण के बचाव में सहयोग जरूर ऱखे। आज का लेख इस तरह से निम्लिखित है। आजादी बूटे दी.... न जाने आने वाले कल का गुजारा कैसे होगा? यह प्रश्न अक्सर उन लोगों के जुबाँ से निकलता है जिन्होंने अपनी जिंदगी में प्रयासरत कार्य किए होते हैं। मेहनत जिंदगी का एक ऐसा कर्म है जिसके  बिना जिंदगी अधूरी है । और जो मेहनत करता है उसको  जिन्दगी में फल भी मिलता है भले ही यह फल देर से मिले ।  अब  मेरे मन में एक विचार इसी पहलू से आलंकित आया है , जिसमे किसान अपने खेतों में पेड़ लगाते हैं। कुछ पेड़- पौधे फलहारी होते हैं तो अन्य पेड़ -पौधो का उपयोग अन्न या घास चारा लकड़ी आदि के उपयोग में आता है । इसी बीच किसानों ने जो पेड़ खेतो में लगाए होते हैं ।उन पेड़ों का एक बहुत ही महत्वपूर्ण उपयोग तब होता है ,जब कड़ी धूप में काम करने के पश्चात किसान आराम  करने के लिए पेड़ की ठण्डी छाया...

संघर्ष चक्र

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नमस्कार दोस्तों मेरी आज की कविता का सम्पादन जीवन  में संघर्ष चक्र से सम्बंधित  है। आशा करती हूँ की आप इस कविता को  ध्यान  से पढ़ेंगे और इस जीवन चक्र में स्वाभविक कठिनायों का हल मिलेगा। इस कविता को अपने बड़े और छोटे सगे सम्बन्धियो से शेयर करें । इस जीवन के संघर्ष चक्र में  बताया गया है कि प्रयास निरतंर करते रहना चाहिए। जिससे  हमारे जीवन की समस्याओं का हल समयनुसार  निकलता जाता है । इंतज़ार बहुत नज़दीक का है , मगर उसकी दूरी  लम्बी लगती है । चाल से ज्यादा कामनाएं बढ़ जाती है , मगर सफ़र में रूचि होने लगती है । धीरे धीरे कामनाओं से ज्यादा हमारा दायरा बढ़ जाता है , उस दायरे  में रहें या बढ़े इसमें हमे असमंजस का होने लगती है । दायरे की तरफ़ बढ़े तो उलझनें  फसा लेती हैं, और दायरे में रहें तो हमारी सोच भी सीमित होने लगती है । उलझनों से सुलझने के लिए फिर दायरा को आगे बढ़ाना पड़ता है , सोच को सीमा से निकलकर  असीमित होने लगती है । जब सोचते वक़्त सीमा पार कर सकते हो , तो जरूर प्रयास की सीमा भी बढ़ने लगती है । जब ...

किसको पता था...चले जाना है ।

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नमस्कार दोस्तों मेरी आज की कविता का शीर्षक है , किसको पता था.... चले जाना है ।  इस्  पताथा कविता के माध्यम से में आज  जिंदगी से जुडी कुछ अहम पहलुओं पर शाब्दिक  दर्शन डालते  हुए प्रकाशित किया है । इस कविता को बहुत कम शब्दों में पूरा बात का व्याख्यान किया है।मेरी  पुरानी कविताओं की तरह इस कविता को भी आपका ढेर सारा प्रेम मिलेगा । और कविता को पढ़ कर आप आनंद मिले इस बात की कामना करती हूं।  कविता के अंत में अपने मूल्यवान  कमेंट करने न भूलें। आपके द्वारा किये हुए कमेंट  शेयर और subscibe ही   मेरी कविता की प्रेरणा का स्त्रोत होते हैं। तो आज की कविता इस तरह से नीचे प्रकाशित की गयी है .... किसको पता था चले  जाना है .. जिस दुनिया से आए थे वापस उसी दुनिया में मुड़ जाना है। किसको पता था चले जाना है.... भाग-दौड़ कर  रहे थे आराम करने के लिए, आराम छोड़कर ही भाग रहे थे। किसको पता था  चले जाना है.... यहाँ - वहाँ  जहाँ भी जा रहे थे , उसी जगह ख़ता खा रहे थे। किसको पता था  चले जाना है... कुछ अधूरे किस्से...

पसन्द है न बारिश का आना .....

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 नमस्कार दोस्तों ,               मेरी आज की कविता का शीर्षक है , "बारिश का आना" इस कविता के माध्यम से वर्षा की उस स्तिथि का व्याख्यान है जिसका हर कोई लुत्फ़ उठाना चाहता है, इसीलिए आइए आज आपको काल्पनिक वर्षा से आनंदित करवाते  हैं। बारिश का आना .....🌧️🌧️ अच्छा लगता है हमें बारिश का आना, सावन में रिमझिम का बारिश का हो जाना। बारिश की धीमी बूँदों  का छत से  टपक जाना ,  फिर छज्जे से टिप -टिप को देख कर , हमारा कमरे से बाहर आ जाना, फिर  बाहर आँगन में आकर अपनी बाहों  को फैला देना।  अच्छा लगता है ,हमें गर्मियों में हवा का ठंडा हो जाना, और उस सुकून से भरी ठंडी हवा में हमारा राहत की साँस लेना। पहली ही बारिश में नहाते हुए ख़ुशी मनाना, चिलचिलाती गर्मी से चैन की जन्नत  पाना। हाँ ,अच्छा लगता है हमें बारिश का आना ,  हमारा गर्दन ऊपर करके आसमाँ की तरफ चेहरा  मुस्कुराते हुए ख़ुशी में झूम जाना । गर्म हवाओं  के बीच बारिश को बुलाना, ज़मीन के क्षेतिज समांतर हाथों  को  फैलान...

राखी का उत्सव .......

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नमस्कार ,               मेरी आज इस कविता का सम्बन्ध राखी के विशेष उत्सव से है । इस  काव्य रचना के माध्यम से राखी के उत्सव को कैसे मनाया जाता है  और बहन -भाई का यह दिन कितना खास होता है  इस शब्द को माध्यम से बताया गया है । आशा करती हूं आपको ये पंक्तियां पसन्द आएगी और आप  कमेंट  करके बताएं और अपने भाई बहन से शेयर करके बधाई दे।             उत्सव राखी का ... श्रावण माह का खास दिवस आया है , राखी का उत्सव ढेर सारी खुशियाँ लाया है। भाई-बन्धुओ ने अपनी रूठी हुई बहन को मनाया है, खास उपलक्ष्य में बहन ने  भी पूजा का थाल सजाया है। चन्दन, दीपक, और फूलों की खुशबू से महकाया है, राखी, अक्षत के साथ मिष्ठान ने भाई को ललचाया है । नित स्नान कर आज सुबह भाई नए वस्त्र धारण कर आया है, उतार कर आरती , लाडली बहन ने मस्तक पर तिलक सजाया है।  भाई ने दाहिनी कलाई आगे बढ़ाकर , रक्षा की डोर को बँधाया है, खुशिओं के इस पावन उत्सव पर बहन -भाई का चेहरा खिलखिलाया है। अब...

एक नाम मिसाईल मैन लौट आए....

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नमस्कार दोस्तों,    मेरी आज की कविता का शीर्षक है  " एक नाम मिसाइल मैन लौट आए" ।   इस कविता के माध्यम से  डॉ कलाम जी की जीवन शैली को प्रकाशित किया गया है । उनके आरंभिक जीवन के संघर्ष से लेकर पूर्ण जीवन की सफलता को काव्य में व्यक्त किया गया है। आशा करती हूं यह कविता आपको पसंद आएगी और आप कमेंट में जरूर करें । काश ! कलाम सर का मुस्कुराता हुआ चेहरा वापस लौट आए, ख़ामोशी से सजी हुई, वीणा की तान वापस लौट आए।   हौंसलों से बुलन्द अपूर्त जहान लौट आए, आगामी स्कूल कॉलेज के छात्रों  के आदर्श लौट आए। बच्चों में बचपना और बुजुर्गों का अनुभव लौट आए, जीव -प्राणी से प्रेम , और ईमानदार छवि की पहचान लौट आए। अख़बार बेचते हुए, संघर्षवादी जीवन का उत्थान लौट आए, देश के  नए राष्ट्रपति बने,  वो कलाम सर की तस्वीर वाली अख़बार लौट आए। राष्ट्रपति भवन की शान Dr. A.P.J. अब्दुल कलाम लौट आए,  संदूक और 2 सूट वाले महान  लौट आए। प्रेरक विचारों से लिखी हुए किताबों के लेखक लौट आए, एयरोस्पेस का इंजीनियर लौट आए। रक्षा अनुसंधान...

मैं ढूँढता कहाँ हूँ.....

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नमस्कार दोस्तों ,           मेरी अगली कविता का शीर्षक है, " मैं ढूंढता कहाँ हूँ " । आशा करती हूँ हमेशा की तरह यह कविता  भी आपको पसंद आएगी और आप मेरी इस पोस्ट पर कमेंट और शेयर करना  न भूलें। मैं ढूंढता कहाँ हूँ... मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँ? हीरा समझ कर , कोयले की खान में ढूंढता हूँ। थकता बहुत हूँ, मगर हार नही मानता हूँ। मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँ ? चाँद समझ कर , आसमाँ के सितारों में टिमटिमाता हूँ। देखता बहुत हूँ, मगर नज़र नही आता हूँ।  तुम्हें कहाँ ढूँढूँ ? महज़बीन समझ कर  आईना के सामने मुस्कुराता हूँ। खुश बहुत हूँ, मगर फिर भी तुम्हें अपने से दूर पाता हूँ। प्रिय !अब मैंने तुम्हें ढूँढ लिया है... पूछो कहाँ? . . . अदृश्य समझ कर , तेरी तस्वीर बनाता हूँ। बाहर से ढूँढता बहुत हूँ, मगर अपने ही दिल के अंदर पाता हूँ। इस कविता को पढ़ने के लिए शुक्रिया ।भविय की पोस्ट ल् लिये इस ब्लॉग को फॉलो जरूर करें।

आत्मनिर्भरता ...

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हम आते  जाते  योजनाएं बनाकर  चले जाते हैं, दूसरों को सलाह देकर खुद मज़े से सो जाते हूँ, बनी बनाई योजनाओं को फिर भूल जाते हूँ, हर  बार मुसीबत पड़ने पर किसी न किसी पर निर्भर हो जाते हैं। जब ईश्वर ने मनुष्य को सद्बुद्धि दी  और कर्मठ काया , तो फिर क्यों किसी दूसरे इंसान को अपनी आड़ है बनाया ? अपने काम के लिए दूसरों पर निर्भर होकर ,कोई वजूद नही रहता है, अगर हमारा पेट बग़ैर मेहनत किए ही भर जाता है।  माना कि बाहर से तो  पेट भर गया ,  मगर अंदर से दिल संतुष्ट नही होता है। आस पड़ोस सबका एक जैसा ही हाल हो जाता है , काम शुरू कौन करेगा? इस ख्याल से सब बेचैन हो जाते हैं। मानता हूं इस दुनिया ने लोगो को खूब दौड़ाया है, लेकिन इसी लम्बी दूरी के बाद  आत्मनिर्भर  भी तो बनाया है। बड़े बड़े  देशों ने है हिन्दुस्तान के आगे  सर  झुकाया है,  कड़ी मेहनत करके सबने खूब पसीना बहाया है। आत्मनिर्भर बनकर  कर देंगे विश्व पटल पर धमाल, सारी  दुनिया देखेगी, हिंदुस्तान में  हुआ है कमाल। अब दोबारा ये गलती नही दोहराएंगे,  न अब  ...

मिल-बाँट कर खाने की रीति बनाएँ

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  नमस्कार दोस्तों मेरी आज की कविता एक चिड़िया की व्यवहारिक  जीवन  पर केंद्रित है, आशा करती हूँ आप सबको पसन्द आएगी , कविता पढ़ने के साथ ब्लॉग को subscribe जरूर करें। सुबह के वक़्त वो डाल पर बैठकर चहचहाती है, मुझे सोई हुई को गहरी नींद से जगाती है। मेरे पास जाने से वो अपने पंख फड़फड़ाती है, फुर्ती से  खोलकर पंख वो डरती हुई उड़ जाती है। थोड़ी देर में वापस उसी डाल पर चीं-चीं करके बुलाती है, अंगूर की बेल पर अपनी तेज़ नज़र मुझ पर दौड़ती है। पक्के अंगूर के गुच्छे देखकर मेरी जीभ से ललचाते हुए लार टपक जाती है, अंगूर के पास जाकर ,कच्चे अंगूर खाने से मेरी आँख मिचमिचाती है।  मेरे बेल के भीतर जाने से , चिड़िया छत पर लौट जाती है, किन्तु जाते -जाते  पक्के अंगूरों को जूठा कर जाती है।  मैं भी बेल से जूठे अंगूर  तोड़कर फेंक आती हूँ, चिड़िया तो फिर अगले दिन पक्के हुए अंगूर चख जाती है। कुछ पल  मेरी और चिड़िया की पकड़न पकड़ते चलती है, छोटी सी चिड़िया हमसे न पकड़ी जाती है। फिर इसी प्रतियोगिता के चलते एक बात समझ में आती है, अन्न- जल सब...

YOG life.

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If you spend a single day without yog, then your day is incomplete even if you achieve everything else.  Doing yog everyday develops your inner energy  that is way to live life blissful .#GOodmorning #motivational #yoglife #introvert.💐💐💐

"युद्ध या शान्ति"

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मेरी यह अगली कविता  है इसका शीर्षक है " युद्ध या शान्ति"  इस कविता को जरूर पढ़े और कमेन्ट के जरिए बताएं कैसी लगी । यह कविता ऐसे विषय पर आधारित है जिसमे हकीकत से दूर काल्पनिक युद्ध की कामना करते हैं जो देश अथवा समाज के लिए  सही नही है। बिना मतलब युद्ध की बात करते हो, युद्ध इस  शब्द को तुम मज़ाक समझते हो। घर बैठकर  तुम ज़ुबान लड़ाते हो, सीमा पर डटे सैनिकों का , न तुम कभी हाल  जानते हो। अपने घर की चारदीवारी का मसला तुमसे मिटता नही, सीमा के मसले पर तुम राष्ट्र में विवाद  करते हो। सुरक्षित बैठे दहाड़ने  के नाटक क्यूँ करते हो, जाकर खुद तुम सीमा पर क्यों नहीं लड़ते हो। युद्ध की ख़ामियाज़ा तुम क्या जानते हो , शहीद सैनिक की माँ को तुम नही पहचानते हो। युद्ध का इतिहास काल तुम, कभी नही पढ़ते हो, ये धरती कितनी लहूलुहान हुई है, ये  जख़्म कभी तुम नही देखते हो। आसान नही जो तुम, ये  युद्ध - युद्ध करके  चिल्लाते हो, इंसान नही हो तुम ,अगर शान्ति प्रस्ताव को समझ न पाते हो । गर पता नही मैदानी लड़ाई का, तो मत चिल्लाया करो, कभी युद्ध के मैदान...

Love for Lord Shiva

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Visiting a shiva  temple on  Monday mornings is more enjoyable peaceful, intellectual lovely , prosperous and beautiful rather  than dating a girl for whole week❤️ Om namoh shivay 💐💐💐

ऑनलाइन पढ़ाई की रीत है आई✍️✍️

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स्कूल में छोड़ कर  ,मास्टर जी की सख़्त करवाई, अब बिना कागज़ और सियाही के हो रही पढ़ाई। अनपढ़ माँ-बाप ने पूछ कर लॉगइन आई डी ली बनवाई, जिन्होंने पहले खुद कभी कोई किताब न थी उठाई। अपने ज़माने में भले उनको स्कूल की खबर न  हुई  , मगर अब वक़्त के साथ एक-एक करके सब ज़मात ऑनलाइन ली लगाई। कहाँ से ऑडियो, वीडियो का बटन दिया दबाई,  ये ज़ूम् और गूगल  एप्प की तकनीक बहुत बार चलाकर समझ न आई। बच्चों के साथ खुद के दिमाग़ की भी  हो रही खपाई, अनपढ़ माँ -बाप ने कैसे ऑनलाइन पढ़ाई करवाई। जिन विद्यार्थियो ने बड़ी ज़मात में एडमिशन ली है कराई, उन्होंने  खुद  सुबह से शाम तक फ़ोन में गर्दन झुकाकर  नजरें रखी हैं गढ़ाई। कैसे समझाएं  घर वालो को , क्या होती है ये ऑनलाइन पढ़ाई, माँ बाप भी इंजतार में है  इम्तिहान की घड़ी जल्दी क्यों न आई। हर महीने पढ़ाई की सुविधा के लिए महँगे नेटवर्क वाला  नैट पैक  लिया  लगवाई, इसी बहाने यूट्यूब , व्हाट्सप और  फेसबुक भी मज़े से लिया चलाई। सीख कर पढ़ाई के साथ कुछ कला, फिर  प्रतियोगिता में भी किस्मत को लिया आजमाई धीरे ...