रूह के लगाव से इश्क़ के घाव
रूह के लगाव से इश्क़ के घाव लगाव से डरते हैं, लग न जाए , कोई गहरा घाव उससे डरते हैं । इश्क़ से क्या डरना , अगर मौत पूछ कर आए , तो इश्क़ के स्वागत से क्या डरना? मगर जब रूह ही मर जाए , तो लगाव किससे करना? हम रूहानी बंदे हैं, हमें अपनों से तो इश्क़ है मगर हमारा इश्क़ भी अपना नहीं हैं। जो लगाव अपनों से है , वो लगाव रूह से है , हमारी रूह को हमसे भी इश्क़ है , इसलिए हम बचते हैं कि कहीं हमारी अपनी रूह के लगाव ही हमें इश्क़ के घाव न लगा दे । अपना सहयोग बनाएं रखें , हमारे प्रयास को पढ़ने के लिए शुक्रिया ।