रूह के लगाव से इश्क़ के घाव

 रूह के लगाव से

 इश्क़ के घाव


लगाव से डरते हैं,

लग न जाए ,

कोई गहरा घाव उससे डरते हैं ।


इश्क़ से क्या डरना ,

अगर मौत पूछ कर आए ,

तो इश्क़ के स्वागत से क्या डरना?


मगर जब रूह ही मर जाए ,

तो लगाव किससे करना?

हम रूहानी बंदे हैं,

हमें अपनों से तो इश्क़ है 

मगर हमारा इश्क़ भी अपना नहीं हैं।


जो लगाव अपनों से है ,

वो लगाव रूह से है ,

हमारी रूह को हमसे भी इश्क़ है , 

इसलिए

हम बचते हैं कि 

कहीं हमारी अपनी रूह के लगाव 

ही हमें इश्क़ के घाव न लगा दे ।



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