Visiting a shiva temple on Monday mornings is more enjoyable peaceful, intellectual lovely , prosperous and beautiful rather than dating a girl for whole week❤️
नमस्कार दोस्तों, हमारी आज की कविता का शीर्षक है , कभी -कभी हमें .... .... तुम याद आते हो । हम आपसे उम्मीद करते हैं, कि आप यह कविता जरूर पढ़ेंगे और अंत में कमेन्ट करके ज़रूर बताएंगे कि हमारी यह कविता आपको कैसी लगी ? इससे आगे पंक्तियां हैं :- 1) कभी -कभी हमें वो बीती हुई ,घड़ियाँ याद आती हैं, जब हम दिल के पैग़ाम लिए , उनके क़रीब से ख़ाली गुज़र जाते थे। 2) कभी -कभी हमें वो चोट खाए हुए ,घावों के निशान याद आते हैं , जब हमारे घावों पर ,तुम्हारे कोमल हाथों के स्पर्श मात्र से मरहम और दारू का असर लगता था। 3)कभी -कभी हमें वो तुम्हारा गुस्से वाला चेहरा नज़र आता था , जब तुम्हारी लाल आँखों में , प्रेम की चाह के अश्रु प्रवाहित होते थे। 4)कभी -कभी हमें तुम्हारी , वो बर्दाश्त की हुई नाराज़गी याद आती थी, जब तुम्हारे बुराँश के फूल से खिले होंठो से गूँजती नज़्मो को आवाज़ धीमी हो जाती थी। 5) कभी -कभी हमें तुम इतना याद आते हो ,इतना ज़्यादा या...
हिचकी आ रही थी........ सोचा कोई याद कर रहा होगा; फिर, फिर सोचा, कौन याद करेगा ? और अक्सर यही होता है कि हम सोचते हैं। फिर अपनी तन्हाई को याद किया, तो पता चला कि, अक्सर 'मुझे' तो तन्हाई ही याद करती है । इस तरह 'मैं 'और 'मेरी अपनी तन्हाई' अक्सर याद करते रहते हैं। वैसे उम्मीद है, कि 'तुम्हें' .... तो कोई याद करता होगा; कि तुम्हें भी कोई याद नहीं करता,,... बैठे-बैठे तुम भी मेरी तरह 'अपनी तन्हाई' को याद करके देखो! पता चले,,, कि तुम्हारी तन्हाई भी, मेरी तरह तुम्हें याद कर रही हो। और! जरूरी भी है, तन्हाई को याद करना। भला आजकल इतने लोग कहां हैं? जो कोई हमें याद करेंगा। जब तक हम किसी को याद नहीं करेंगे, (हिचकी) हमें भी उससे पहले कोई याद (हिचकी ) नहीं करने वाला। चलो अब यह पढ़ते- पढ़ते एक बात तो है कि आप लोग मुझे जरूर याद करोगे। अब:; मेरी तन्हाई……...... मुझसे रूठ जाएगी !!!! कहेगी.. मेरे सिवा तुम्हें , और कोई याद क्यों कर रहा है? फिर मैं उसे तनहाई को कहूंगी, कि... देखो ! इन लोगों के पास तुम जाती हो तो यह लोग तुम्हें भी याद करते हैं । इस तरह से वही लोग मुझ...
नमस्कार दोस्तों , मेरी अगली कविता का शीर्षक है, " मैं ढूंढता कहाँ हूँ " । आशा करती हूँ हमेशा की तरह यह कविता भी आपको पसंद आएगी और आप मेरी इस पोस्ट पर कमेंट और शेयर करना न भूलें। मैं ढूंढता कहाँ हूँ... मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँ? हीरा समझ कर , कोयले की खान में ढूंढता हूँ। थकता बहुत हूँ, मगर हार नही मानता हूँ। मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँ ? चाँद समझ कर , आसमाँ के सितारों में टिमटिमाता हूँ। देखता बहुत हूँ, मगर नज़र नही आता हूँ। तुम्हें कहाँ ढूँढूँ ? महज़बीन समझ कर आईना के सामने मुस्कुराता हूँ। खुश बहुत हूँ, मगर फिर भी तुम्हें अपने से दूर पाता हूँ। प्रिय !अब मैंने तुम्हें ढूँढ लिया है... पूछो कहाँ? . . . अदृश्य समझ कर , तेरी तस्वीर बनाता हूँ। बाहर से ढूँढता बहुत हूँ, मगर अपने ही दिल के अंदर पाता हूँ। इस कविता को पढ़ने के लिए शुक्रिया ।भविय की पोस्ट ल् लिये इस ब्लॉग को फॉलो जरूर करें।
Hr hr Mahadev
जवाब देंहटाएंHar har mhadev
हटाएं